हिंदी क्यों सीखें? भाषा से आगे, अपनी पहचान तक
- Ranju Sarawagi

- 3 days ago
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‘हिंदी आनी चाहिए।’
यह बात सुनने में बहुत साधारण लगती है, लेकिन अगर हम ठहरकर सोचें, तो इसके पीछे हमारी भाषा, हमारी संस्कृति, हमारी जड़ों और हमारी पहचान से जुड़ी एक बहुत गहरी भावना है।
आज के समय में बच्चों के लिए अंग्रेज़ी सीखना आवश्यक है। दुनिया से जुड़ने के लिए कई भाषाएँ सीखना भी बहुत अच्छी बात है। लेकिन इस दौड़ में अपनी भाषा कहीं पीछे न छूट जाए, यह भी उतना ही ज़रूरी है। हिंदी में mastery हासिल करना हर बच्चे के लिए संभव हो, यह आवश्यक नहीं। लेकिन कम से कम हिंदी बोलना, पढ़ना और लिखना आना चाहिए। क्योंकि भाषा केवल communication का माध्यम नहीं होती; वह हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है।
कभी-कभी बच्चे को भाषा नहीं, अपने ऊपर विश्वास चाहिए होता है
एक बच्चे की कहानी मुझे हमेशा याद आती है।
मेरे विद्यार्थी Advik के मन में विचारों की कोई कमी नहीं थी। वह बहुत कुछ सोच सकता था, उसके पास अच्छे शब्द थे, कल्पनाशक्ति थी और अपनी बात कहने की क्षमता भी थी। लेकिन हिंदी में लिखते समय वह अपने विचारों को उतने confidence के साथ कागज़ पर नहीं उतार पाता था।
शब्द उसके मन में थे, लेकिन उन्हें सुंदर वाक्यों और रचनात्मक लेखन में बदलना उसके लिए आसान नहीं था।
धीरे-धीरे अभ्यास हुआ। उसने शब्दों को जोड़ना सीखा, विचारों को क्रम देना सीखा और सबसे महत्वपूर्ण, उसने यह विश्वास करना सीखा कि ‘मैं हिंदी में भी अपनी बात अच्छी तरह कह सकता हूँ।’
आज वही बच्चा creative writing करते समय अपने विचारों को जिस खूबसूरती से व्यक्त करता है, उसे देखकर एक शिक्षक के रूप में सबसे बड़ी खुशी यही होती है कि उसकी क्षमता अब केवल उसके मन तक सीमित नहीं है। वह उसे शब्द दे पा रहा है।
और शायद यही भाषा सीखने की सबसे बड़ी उपलब्धि है, जब हमारे मन में मौजूद विचार हमारी भाषा में अपना रास्ता खोज लेते हैं।
हिंदी केवल एक subject नहीं है
जब हिंदी को केवल एक school subject मान लिया जाता है, तो बच्चे अक्सर पूछते हैं, “इसे सीखना क्यों ज़रूरी है?”
लेकिन हिंदी को केवल परीक्षा के अंकों के नजरिए से देखने की जरूरत नहीं है।
हिंदी वह भाषा है जिसमें बच्चे अपने दादा-दादी से सहज होकर बात कर सकते हैं। वह भाषा है जिसमें घर की कहानियाँ, त्योहारों की यादें, लोकगीत, कविताएँ और बचपन की स्मृतियाँ अक्सर सबसे स्वाभाविक लगती हैं।
एक बच्चा जब अपने परिवार की भाषा समझता है, तो वह केवल शब्द नहीं सीखता। वह उन शब्दों के पीछे छिपी संस्कृति और भावनाओं को भी समझता है।
‘माँ’, ‘मिट्टी’, ‘घर’, ‘अपनापन’, ‘त्योहार’, ‘बचपन’, इन शब्दों का अर्थ dictionary से कहीं बड़ा होता है। इनके साथ अनुभव जुड़े होते हैं।
इसीलिए अपनी भाषा सीखना अपनी जड़ों को पहचानना भी है।
‘मुझे हिंदी आती है’ से ‘मुझे हिंदी पर गर्व है’ तक
विदेशों में रहने वाले या ऐसे परिवारों के बच्चे जहाँ हिंदी रोज़मर्रा की भाषा नहीं है, उनके लिए अपनी भाषा से जुड़ना कभी-कभी और भी चुनौतीपूर्ण होता है।
लेकिन जब कोई बच्चा पहली बार हिंदी में पूरा paragraph पढ़ता है, अपने विचार लिखता है, किसी कहानी को समझकर उस पर चर्चा करता है या मंच पर हिंदी में भाषण देता है, तो उसके चेहरे पर दिखाई देने वाला confidence बहुत खास होता है।
हमारे कई विद्यार्थी बताते हैं कि हिंदी की कक्षा में की गई तैयारी के आधार पर उन्होंने स्कूल में भाषण दिया और उसके लिए उन्हें appreciation मिली। उस appreciation ने उन्हें केवल खुशी ही नहीं दी, बल्कि आगे हिंदी पढ़ने और अपनी भाषा को और बेहतर करने के लिए प्रेरित भी किया।
यही छोटी-छोटी सफलताएँ भाषा के प्रति दृष्टिकोण बदल देती हैं।
पहले बच्चा सोचता है-‘मुझे हिंदी पढ़नी है।’
फिर वह सोचने लगता है-‘मैं हिंदी में अच्छा कर सकता हूँ।’
और एक दिन वह कहता है-‘मुझे हिंदी आती है और मुझे इस पर गर्व है।’
भाषा हमें अपनी कहानी कहने की ताकत देती है
हर बच्चे के भीतर एक कहानी होती है,उ सके अनुभव, उसकी कल्पना, उसकी भावनाएँ और उसके विचार।
भाषा उस कहानी को दुनिया तक पहुँचाने का माध्यम है।
अगर बच्चा अपनी भावनाओं को हिंदी में व्यक्त कर सकता है, हिंदी में कहानी लिख सकता है, किसी विषय पर अपने विचार रख सकता है या अपने परिवार के साथ सहज बातचीत कर सकता है, तो वह केवल भाषा नहीं सीख रहा। वह अपनी अभिव्यक्ति की एक और खिड़की खोल रहा है।
और जितनी भाषाएँ हम सीखते हैं, उतने ही अलग-अलग दृष्टिकोणों से दुनिया को देखने की क्षमता हमारे भीतर विकसित होती है।
इसलिए हिंदी सीखना किसी दूसरी भाषा के विरुद्ध खड़ा होना नहीं है। बल्कि यह multilingual दुनिया में अपनी एक मजबूत पहचान बनाए रखना है।
बच्चों को perfect Hindi नहीं, connected Hindi चाहिए
कई माता-पिता यह सोचकर चिंतित होते हैं कि उनका बच्चा हिंदी में fluent नहीं है। लेकिन शायद शुरुआत perfection से नहीं, connection से होनी चाहिए।
हर बच्चा साहित्यकार बने, यह जरूरी नहीं। हर बच्चा व्याकरण में expert बने, यह भी जरूरी नहीं।
लेकिन अगर वह अपने दादा-दादी से हिंदी में कुछ बातें कर सके, किसी हिंदी कहानी को पढ़कर समझ सके, अपने विचारों को कुछ पंक्तियों में लिख सके और हिंदी में अपनी बात कहने में संकोच न करे,तो यह भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
हिंदी में mastery न हो, तो भी कोई बात नहीं; लेकिन हिंदी से रिश्ता बना रहना चाहिए।
क्योंकि भाषा जितनी पढ़ी जाती है, उतनी ही जी भी जाती है।
अपनी भाषा पर गर्व क्यों?
हम दुनिया की जितनी भाषाएँ सीखें, उतना अच्छा है। नई भाषाएँ नए अवसर देती हैं, नई संस्कृतियों से परिचित कराती हैं और हमारी दुनिया को बड़ा बनाती हैं।
लेकिन अपनी भाषा हमें यह याद दिलाती है कि हम कहाँ से आए हैं।
हिंदी हमारी कहानियों की भाषा है, हमारी कविताओं की भाषा है, हमारे अनेक परिवारों की बातचीत की भाषा है और करोड़ों लोगों के भावों की अभिव्यक्ति है।
इसलिए हिंदी सीखना केवल अतीत को संभालना नहीं है। यह आने वाली पीढ़ी को अपनी विरासत सौंपना भी है।
शायद हमें अपने बच्चों से यह नहीं कहना चाहिए कि ‘तुम्हें हिंदी में सबसे अच्छा होना ही है।’
हमें उनसे बस इतना कहना चाहिए-
‘हिंदी सीखो। बोलो। पढ़ो। लिखो। गलतियाँ करो और फिर सीखो। क्योंकि यह केवल एक भाषा नहीं है, यह तुम्हारी पहचान का एक हिस्सा है।’
और जब कोई बच्चा अपनी भाषा में आत्मविश्वास के साथ अपनी बात कहता है, तो उस क्षण केवल एक विद्यार्थी आगे नहीं बढ़ता।
उसकी भाषा, उसकी संस्कृति और उसकी जड़ें भी उसके साथ आगे बढ़ती हैं।




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